अजीब मन्तिक़ से दिल हमारे भरे हुए हैं

अजीब मन्तिक़ से दिल हमारे भरे हुए हैं
करीब आ कर अचानक उस से परे हुए हैं

विसाल को हिज्र कहते कहते गुज़र रही है
किसी की क़ुर्बत से इस क़दर हम डरे हुए हैं

हम अपनी अपनी सज़ा, ज़जा को पहुँच चुके हैं
तुम्हारे सिक्के, हमारे खोटे खरे हुए हैं

यह बरगदों की कहानियाँ ठीक हैं मगर हम
घरों में बैठे बिठाए पूरे हरे हुए हैं

मैं हँसते हँसते बता रहा था ख़ुदा को कल शब
कि लोग मुझ जैसे बे़ज़र से डरे हुए हैं

फिर एक दिन हमने ज़िन्दगी का सुराग पाया
फिर एक दिन हमने कह दिया हम मरे हुए हैं
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