बहुत शिद्दत से जो क़ायम हुआ था

बहुत शिद्दत से जो क़ायम हुआ था
वो रिश्ता हम में शायद झूठ का था।
मोहब्बत ने अकेला कर दिया है
मैं अपनी ज़ात में इक क़ाफ़िला था।
मेरी आँखों में बारिश की घुटन थी
तुम्हारे पाँव बादल चूमता था।
खजूरों के दरख़्तों से भी ऊँचा
मेरे दिल में तुम्हारा मर्तबा था।
मोहब्बत इस लिए भी की गई थी
हमारा शेर कहना मसअला था।
मुझे इक फूल ने समझाई दुनिया
जो मेरे सब्ज़ बाग़ों में खिला था।
ज़हूर-ए-आदम ओ हव्वा से पहले
हमारे वास्ते सब कुछ नया था।
ज़मीन पर जब ज़मीनी मसअले थे
तो बारिश भी मुकम्मल वाक़िआ था।
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