गुज़र चुके हैं जो उनके निशान ही देख आएं

गुज़र चुके हैं जो उनके निशान ही देख आएं
बुझी है आग तो चल कर धुआं ही देख आएं

गुज़श्तगान की महरूमियां ही देख आएं
खंडर में बिखरी हुई रसियां ही देख आएं

ज़रूरतें न सही, ख्वाहिशें तो पूरी हों
खरीद सकते नहीं तो दुकान ही देख आएं

गुरैज़ करती हुई ख़ल्क से ज़रा हट कर
कलाम करती हुई खिर्कियां ही देख आएं

तवाफ़ करते हुए दिल पे हाथ रखे हुए
हम अपने यार का ख़ाली मकां ही देख आएं
Share: