है जो ग़ुलाम-ए-मोहम्मद वो है ग़ुलाम-ए-अली

है जो ग़ुलाम-ए-मोहम्मद वो है ग़ुलाम-ए-अली
हुज़ूर ने है बताया हमें मक़ाम-ए-अली

अभी हदीस का मतलब नहीं खुला तुझ पर
अभी तू सीख फ़क़ीरों से एहतिराम-ए-अली

हराम उन पे नहीं सोज़-ओ-साज़ जिन के दिल
भरे हुए हों तरन्नुम से ले के नाम-ए-अली

हम अहल-ए-हिंद गज़ब के हैं रिंद और हमें
हसन हुसैन पिलाते हैं भर के जाम-ए-अली

बस इक इशारा बहुत है अगर समझ पाओ
यहाँ कलाम-ए-मोहम्मद वहाँ कलाम-ए-अली

तिरे लिए तो मैं ज़हमत न दूँगा मौला को
तिरे लिए तो बहुत है अभी ग़ुलाम-ए-अली

कलंदरों की तरीक़त में लाज़मी है 'नदीम'
कि एहतिमाम से मिल कर मनाए शाम-ए-अली
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