जल्वा-ए-नूर के लिए जिस्म नक़ाब हो गया

जल्वा-ए-नूर के लिए जिस्म नक़ाब हो गया
तू तो रहा हिजाब में, मैं बेहिजाब हो गया।
कर्ब-ओ-बला के बाद अब कश्ती-ए-नूह चाहिए
प्यास की बारगाह में पानी अज़ाब हो गया।
चश्म-ए-फलक नुमा खुली, ख़्वाब गिरा के सो गई
ख़्वाब के टूटने का ग़म बाइस-ए-ख़्वाब हो गया।
सफ़्हों पे ढूंढिए मुझे, सतरों में पाइए मुझे
लिखते हुए किताब-ए-इश्क़ में भी किताब हो गया।
उम्र के कारोबार में सांसों पे बात रुक गई
बात अभी चली न थी और हिसाब हो गया।
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