ख़याल आया है अपना सँवरना चाहते हैं
इक इंतज़ार जो करते थे, करना चाहते हैं
उसे कहो कि वो अपने घड़े तो भर जाए
उसे कहो मेरे दरिया उतरना चाहते हैं
अदा-ए-हुस्न ज़रा सा तरस ज़रूरी है
कहीं वो मर ही न जाएँ जो मरना चाहते हैं
ये लोग वो हैं जिन्हें नौकरी क़बूल न थी
अब उस गली में कोई काम करना चाहते हैं
इक इंतज़ार जो करते थे, करना चाहते हैं
उसे कहो कि वो अपने घड़े तो भर जाए
उसे कहो मेरे दरिया उतरना चाहते हैं
अदा-ए-हुस्न ज़रा सा तरस ज़रूरी है
कहीं वो मर ही न जाएँ जो मरना चाहते हैं
ये लोग वो हैं जिन्हें नौकरी क़बूल न थी
अब उस गली में कोई काम करना चाहते हैं

