ख़ुदा मिलाते हैं ज़ौक़-ए-ख़ुदाई देते हैं
अली के बेटे हमें मुस्तफ़ाई देते हैं
हज़ार हाय! वो लश्कर न सुन सका लेकिन
हुसैन हिंद में अब तक सुनाई देते हैं
जहाँ के लोग जहाँ तक ख़ुदा समझते हैं
वहाँ तलक तो अली ही दिखाई देते हैं
भरा हुआ है मेरा आँसुओं से मश्कीज़ा
कि ये सबील फ़क़त कर्बलाई देते हैं
अजब चराग़ बुझाया हमारे मौला ने
फ़क़ीर आज भी रोशन दिखाई देते हैं
अली के बेटे हमें मुस्तफ़ाई देते हैं
हज़ार हाय! वो लश्कर न सुन सका लेकिन
हुसैन हिंद में अब तक सुनाई देते हैं
जहाँ के लोग जहाँ तक ख़ुदा समझते हैं
वहाँ तलक तो अली ही दिखाई देते हैं
भरा हुआ है मेरा आँसुओं से मश्कीज़ा
कि ये सबील फ़क़त कर्बलाई देते हैं
अजब चराग़ बुझाया हमारे मौला ने
फ़क़ीर आज भी रोशन दिखाई देते हैं

