रूह हाज़िर है मेरे यार कोई मस्ती हो

रूह हाज़िर है मेरे यार कोई मस्ती हो
हल्क़ा-ए-रक़्स है तैयार कोई मस्ती हो

मुझ को मिट्टी के प्याले में पिला ताज़ा शराब
जिस्म होने लगा बे-कार कोई मस्ती हो

चार सम्तों ने तेरे हिज्र के घुंघरू बांधे
और हम लोग भी हैं चार कोई मस्ती हो

विर्द करना है मन-ओ-तू का मुझे वक़्त-ए-नमाज़
बे-वुज़ू हूँ मेरी सरकार कोई मस्ती हो

कोई वाइज़ हो वज़ीफ़ा न कोई सौम-ओ-सलात
जान छूटे मेरी इक बार कोई मस्ती हो

तेरे एहसास की शिद्दत से भरा बैठा हूँ
अब के इनकार न इकरार कोई मस्ती हो

बे-नियाज़ाना रहेगा तिरी दुनिया में फ़क़ीर
ख़्वाब-ओ-ख़्वाहिश नहीं दरकार कोई मस्ती हो
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