सहरा में जा रहे हो तुम मजनूं अगर दिखाई दे
कहना करे धमाल उधर, धूल इधर दिखाई दे।
मेरे सिवा कोई नहीं, मैं भी अगर यहां नहीं,
फिर यह हिजाब किस लिए नीचे उतर दिखाई दे।
खींच लकीर चांद पर, माह को निस्फ कर के मिल,
आधा खुदा सुझाई दे, आधा बशर दिखाई दे।
सोच हमारी अक़्ल से उस बेमिसाल का जमाल,
देख हमारी आंख से तुझ को अगर दिखाई दे।
अपने खुदा से आज मैं नशे में मिल के रो दिया,
रोते हुए उसे कहा, परदा न कर, दिखाई दे।
या तो करोड़ आंख हो, या मेरी ऐसी आंख हो,
तू ही फ़क़त दिखाई दे, मुझ को जिधर दिखाई दे।
कहना करे धमाल उधर, धूल इधर दिखाई दे।
मेरे सिवा कोई नहीं, मैं भी अगर यहां नहीं,
फिर यह हिजाब किस लिए नीचे उतर दिखाई दे।
खींच लकीर चांद पर, माह को निस्फ कर के मिल,
आधा खुदा सुझाई दे, आधा बशर दिखाई दे।
सोच हमारी अक़्ल से उस बेमिसाल का जमाल,
देख हमारी आंख से तुझ को अगर दिखाई दे।
अपने खुदा से आज मैं नशे में मिल के रो दिया,
रोते हुए उसे कहा, परदा न कर, दिखाई दे।
या तो करोड़ आंख हो, या मेरी ऐसी आंख हो,
तू ही फ़क़त दिखाई दे, मुझ को जिधर दिखाई दे।

