बहुत थक चुका हूं
यही खुद को लिखना अज़ीयत का सहना
मोहब्बत की नज़्में मुकम्मल न होनी
हवा का कोई भेद मुझ पर न खुलना
वही झील और झील का इक किनारा
वही नामुकम्मल कहानी भुलाए न भूले
वो क़िस्सा हमारा
वही चंद पत्थर... लरज़ते हुए अक्स
वही झील का रक्स
वही कैफ़ियत बोर होने लगा हूं
बहुत थक चुका हूं
बदन में थकावट नहीं पर मेरी आत्मा थक चुकी है
मुसाफ़त भी जैसे बहुत बढ़ चुकी है
तज़ब्ज़ुब है सकता है सांसों की लय टूटती जा रही है
कोई साथ है छूटता जा रहा है
मेरे हाथ पांव भी शल हो रहे हैं
मैं पानी में अब डूबता जा रहा हूं
बहुत थक चुका हूं
यही खुद को लिखना अज़ीयत का सहना
मोहब्बत की नज़्में मुकम्मल न होनी
हवा का कोई भेद मुझ पर न खुलना
वही झील और झील का इक किनारा
वही नामुकम्मल कहानी भुलाए न भूले
वो क़िस्सा हमारा
वही चंद पत्थर... लरज़ते हुए अक्स
वही झील का रक्स
वही कैफ़ियत बोर होने लगा हूं
बहुत थक चुका हूं
बदन में थकावट नहीं पर मेरी आत्मा थक चुकी है
मुसाफ़त भी जैसे बहुत बढ़ चुकी है
तज़ब्ज़ुब है सकता है सांसों की लय टूटती जा रही है
कोई साथ है छूटता जा रहा है
मेरे हाथ पांव भी शल हो रहे हैं
मैं पानी में अब डूबता जा रहा हूं
बहुत थक चुका हूं

