अभी तक कुछ नहीं बदला

जहां पर तुम ने छोड़ा था
वहीं मौजूद हूं शायद बहुत महदूद हूं
देखो अभी तक कुछ नहीं बदला
मेरे बिस्तर पे वो ही रात तकिये से लिपट कर रो रही है
जिस का हम ने वस्ल की शब नाम रखा था
मेरे कमरे की इक दीवार पे तस्वीर में वो शाम का मंज़र
तुम्हारी याद में डूबा ही रहता है
अज़ीयत से भरा इक दुख
अभी तक मेज़ पर रखे हुए कागज़ के टुकड़े पर पड़ा है
जो मोहब्बत के किसी भी आखिरी जुमले में होता है
मोहब्बत और नफरत का हर इक लम्हा मेरे सीने में रखा है
न जाने जुर्म क्या है और कैसी क़ैद है जिस में
मैं अपने जिस्म का हर एक हिस्सा क़ैद पाता हूं
चलूं तो पांव में वादों की ज़ंजीरें खनकती हैं
कहीं भी जा नहीं सकता
अभी तक कुछ नहीं बदला
जहां पर तुम ने छोड़ा था
वहीं मौजूद हूं शायद बहुत महदूद हूं
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