हमारा मज़हब तो इश्क़ है
जिसकी शुरुआत भी और अंजाम भी
किसी भी अनदेखे वाकये से जुड़ी हुई है
यह जिस्म क्या है यह जान क्या है?
यह ज़िंदगी का निशान क्या है?
यह कौन रात भर निज़ाम-ए-ख्वाब-ए-विसाल हम में चला रहा है?
यह कौन जिस्मों की रुई चर्खे पे काटता है
तुम्हारा दुख है
तुम्हारा दुख भी अजीब दुख है
हमारे जिस्मों में धड़कनों के रिदम पे धमाल डालता है
हमारी मिट्टी उड़ा रहा है
हमारा क्या है
हमें तो चर्खे के चक्करों में किसी ने उलझा दिया है ऐसे
कि रेत थल की हमारे ज़ख्मों के रास्ते से
हमारे ज़हनों में उगी है
फरीदؒ साईं संभाले रखना
कि हम अभी थल से आشنا भी नहीं हुए हैं
और इश्क़ चर्खे के चक्करों में
हमारे जिस्मों के सारे धागे उलझ चुके हैं
जिसकी शुरुआत भी और अंजाम भी
किसी भी अनदेखे वाकये से जुड़ी हुई है
यह जिस्म क्या है यह जान क्या है?
यह ज़िंदगी का निशान क्या है?
यह कौन रात भर निज़ाम-ए-ख्वाब-ए-विसाल हम में चला रहा है?
यह कौन जिस्मों की रुई चर्खे पे काटता है
तुम्हारा दुख है
तुम्हारा दुख भी अजीब दुख है
हमारे जिस्मों में धड़कनों के रिदम पे धमाल डालता है
हमारी मिट्टी उड़ा रहा है
हमारा क्या है
हमें तो चर्खे के चक्करों में किसी ने उलझा दिया है ऐसे
कि रेत थल की हमारे ज़ख्मों के रास्ते से
हमारे ज़हनों में उगी है
फरीदؒ साईं संभाले रखना
कि हम अभी थल से आشنا भी नहीं हुए हैं
और इश्क़ चर्खे के चक्करों में
हमारे जिस्मों के सारे धागे उलझ चुके हैं

