तुमने देखी है कभी
इश्क़ के मस्त क़लंदर की धमााल
दर्द की ले में पटखता हुआ सर और तड़पता हुआ तन मन।
पीर पत्थर पे भी पड़ जाएं तो धूल उठने लगे।
और किसी ध्यान में लिपटा हुआ ये हिज्रज़दा जिस्म,
रक़्स करता हुआ गिर जाए कहीं,
तो ज़मीन दर्द की शिद्दत से तड़पने लग जाए।
हिज्र की लंबी मुसाफ़त का रिधम,
घोड़ों की टापों में गूंथा हुआ है।
रक़्स दरअसल रियाज़त है किसी ऐसे सफ़र की,
जिसे वो कर नहीं पाया।
तुमने देखे हैं कभी
शहर के वसत में घड़ियाल के रोंदे हुए पल,
जिनमें चाहत के हज़ारों क़िस्से,
इश्क़ के सब्ज़ उजाले में कई ज़र्द बदन,
अपने होने की सज़ा काट रहे हैं।
तुमने देखे नहीं शायद
इश्क़ में हारे हुए जिस्म।
जिस्म ऐसे जो कभी पूरें भी कट जाएं,
तो फिर ख़ूं की जगह अश्क़ निकलते हैं वहां।
हसरतें दिल में छुपाए हुए कुछ लोग यहां,
दम-ब-दम बहती हुई आंखों से लिखते हैं कहानी।
ये नई बात नहीं।
वाक़िया एक है, किरदार बदल जाते हैं।
एक तेशा है मगर वार बदल जाते हैं।
इश्क़ के मस्त क़लंदर की धमााल
दर्द की ले में पटखता हुआ सर और तड़पता हुआ तन मन।
पीर पत्थर पे भी पड़ जाएं तो धूल उठने लगे।
और किसी ध्यान में लिपटा हुआ ये हिज्रज़दा जिस्म,
रक़्स करता हुआ गिर जाए कहीं,
तो ज़मीन दर्द की शिद्दत से तड़पने लग जाए।
हिज्र की लंबी मुसाफ़त का रिधम,
घोड़ों की टापों में गूंथा हुआ है।
रक़्स दरअसल रियाज़त है किसी ऐसे सफ़र की,
जिसे वो कर नहीं पाया।
तुमने देखे हैं कभी
शहर के वसत में घड़ियाल के रोंदे हुए पल,
जिनमें चाहत के हज़ारों क़िस्से,
इश्क़ के सब्ज़ उजाले में कई ज़र्द बदन,
अपने होने की सज़ा काट रहे हैं।
तुमने देखे नहीं शायद
इश्क़ में हारे हुए जिस्म।
जिस्म ऐसे जो कभी पूरें भी कट जाएं,
तो फिर ख़ूं की जगह अश्क़ निकलते हैं वहां।
हसरतें दिल में छुपाए हुए कुछ लोग यहां,
दम-ब-दम बहती हुई आंखों से लिखते हैं कहानी।
ये नई बात नहीं।
वाक़िया एक है, किरदार बदल जाते हैं।
एक तेशा है मगर वार बदल जाते हैं।

