ख़सारा

अभी तो ज़हन की गठरी में मैंने बांध रखा था
मेरी एक नज़्म का एक बंद मुझ से खो गया है
न जाने क्यों मेरी हर सतर में उसकी कमी मौजूद रहती है
तख़य्युल में बहुत भटकी हुई सोचें
क़लम की नोक से रूठी हुई हैं
ख़्याल-ए-ताज़ा भी एक शोक में है
शोक जो आँखों में होता है
कोई भी लफ़्ज़ लिखता हूँ
तो मेरे सामने खोया हुआ वह बंद आ जाता है
जिसमें तुम ही तुम हो
न जाने क्यों मैं तुम को भूलने का सोचता हूँ तो
मेरे अशआर मुझ से रूठ जाते हैं
कि मैं इस रेतली मिट्टी से जितने भी बनाता हूँ
खिलौने टूट जाते हैं
Share: