माधो लाल

कब्रस्तान के गर्द बने बाजार में
मुर्दा लोगों को मैं देख रहा हूँ
धूल में लपटी चोपड़ी रोटी
भूख का सालन
मीठा और नमकीन ज़बान को पूरा स्वाद बख्श रहे हैं
मटी के प्यालें पानी के ज़हर को चूस रहे हैं
शाह हुसैन का लंगर
मधू लाल के बर्तन
लंगर खाने वाले बर्तन देख रहे हैं
तन के बर ने मन की भूख मिटाई है
शाह हुसैन ने रज़म यही समझाई है
इस चलते बाजार में चल कर
जलती हुई एक आग में जल कर
ज़ेर ज़बर में उलझा पेश हुआ है
मधू का दरवेश हुआ है
और दरवेश पे बिंदी बोज़ बना है
बिंदी नुक्ता हुआ
कलमे का भेद खोला
ल और ह में बिंदी सव्त बना
आंखों वालों देख रहे हो
शाह हुसैन ने मधू लाल का बर्का ओढ़ा
बिंदी खत्म किया और नुक्ता खोला
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