नज़्म लिखते हुए सोचना चाहिए
नज़्म टूटेगी तो शायरों के क़लम पर किसी चीख़ का एक धब्बा लगेगा
कोई आग जंगल जलाए बिना ही बुझेगी
कहीं आब-ओ-गिल की कहानी रुकेगी
कोई बात होठों से चिपकी रहेगी
नज़्म तक़दीर है
फाएलन फाएलन फाएलन की त्रिकोण के पीछे छिपी एक ज़ंजीर है
नज़्म आँखों से बहते हुए ख़ून की एक तहरीर है
नज़्म चिड़िया नहीं है जिसे आब-ओ-दाना के लालच में
...कोई शिकारी पकड़कर कहीं बेच दे
नज़्म पत्थर नहीं जो किसी भी दीवाने को मारो तो ज़ख़्मों से लैला मरे
नज़्म तो पाँच कोमल सुरों, रे, गा, मा, धा, नी का एक संगीत है
नज़्म मनमीत है
क़ाफ़ियों के तिलिस्मात और सूरत के बूढ़े आहंग से नज़्म बनती नहीं
अपने फ़नकार की सिम्त जाती हुई
मुस्कुराती हुई, गुनगुनाती हुई
नज़्म गर्दिश में है
और ये गर्दिश फ़क़त क़ाफ़ियों और रदीफ़ों की गर्दिश नहीं
ये ज़माँ-ओ-मकाँ से परे लामकाँ की तलब में
गुनाहों और सवाबों से निकली हुई एक गर्दिश है
जिसमें किसी देवता या परी ज़ाद की कोई ख़्वाहिश नहीं
दाद से भी परे और ड्रामाई अंदाज़ से भी परे
अपनी गर्दिश में गुम
नज़्म हैरत के मारों की एक रौशनी
नज़्म मिट्टी के गीतों की एक रागिनी
नज़्म आज़ाद है और ग़ुलामों की फ़रियाद है
नज़्म दुख है, ख़ुशी जिसमें आबाद है
नज़्म इंसान का रूप धारे हुए
ग़ार से यार तक ले जाता हुआ एक दस्तूर है
नज़्म आज़ाद और पहली आवाज़ है
ख़ाक है, नूर है, ख़ून है
क और न है
नज़्म जन्नत में आदम ने तन्हाई में जब कही थी तो हव्वा बनी
नज़्म आँखों से होती हुई पसलियों में रुकी थी तो हव्वा बनी
नज़्म कहने को तो शायरी है मगर शायरी ही नहीं
शायरी तो ग़ज़ल के तमाशा गुरों का तमाशा हुई
नज़्म तो राज़ है
नज़्म फ़ितरत का संगीत और साज़ है
नज़्म बाहू का इरफ़ान, बुल्ले का विज़दान, ख़्वाजा की दस्तार है
नज़्म ख़ुसरो की मस्ती है, मंसूर का दार है
नज़्म रूमी, सादी, इक़बाल और अत्तार है
नज़्म हैरत के मारों का इनकार है
नज़्म ईसा के लब से अदा जब हुई तो मोहब्बत बनी
और मअबद के दस्तूर को रौंदती ज़ाबता बन गई
नज़्म रावण की लंका जलाती हुई
क़हर ढाती हुई
गुनगुनाती हुई, मुस्कुराती हुई
आग है, राग है, भाग है
नज़्म लिखते हुए सोचना चाहिए
नज़्म टूटेगी तो शायरों के क़लम पर किसी चीख़ का एक धब्बा लगेगा
कोई आग जंगल जलाए बिना ही बुझेगी
कहीं आब-ओ-गिल की कहानी रुकेगी
कोई बात होठों से चिपकी रहेगी
नज़्म तक़दीर है
फाएलन फाएलन फाएलन की त्रिकोण के पीछे छिपी एक ज़ंजीर है
नज़्म आँखों से बहते हुए ख़ून की एक तहरीर है
नज़्म चिड़िया नहीं है जिसे आब-ओ-दाना के लालच में
...कोई शिकारी पकड़कर कहीं बेच दे
नज़्म पत्थर नहीं जो किसी भी दीवाने को मारो तो ज़ख़्मों से लैला मरे
नज़्म तो पाँच कोमल सुरों, रे, गा, मा, धा, नी का एक संगीत है
नज़्म मनमीत है
क़ाफ़ियों के तिलिस्मात और सूरत के बूढ़े आहंग से नज़्म बनती नहीं
अपने फ़नकार की सिम्त जाती हुई
मुस्कुराती हुई, गुनगुनाती हुई
नज़्म गर्दिश में है
और ये गर्दिश फ़क़त क़ाफ़ियों और रदीफ़ों की गर्दिश नहीं
ये ज़माँ-ओ-मकाँ से परे लामकाँ की तलब में
गुनाहों और सवाबों से निकली हुई एक गर्दिश है
जिसमें किसी देवता या परी ज़ाद की कोई ख़्वाहिश नहीं
दाद से भी परे और ड्रामाई अंदाज़ से भी परे
अपनी गर्दिश में गुम
नज़्म हैरत के मारों की एक रौशनी
नज़्म मिट्टी के गीतों की एक रागिनी
नज़्म आज़ाद है और ग़ुलामों की फ़रियाद है
नज़्म दुख है, ख़ुशी जिसमें आबाद है
नज़्म इंसान का रूप धारे हुए
ग़ार से यार तक ले जाता हुआ एक दस्तूर है
नज़्म आज़ाद और पहली आवाज़ है
ख़ाक है, नूर है, ख़ून है
क और न है
नज़्म जन्नत में आदम ने तन्हाई में जब कही थी तो हव्वा बनी
नज़्म आँखों से होती हुई पसलियों में रुकी थी तो हव्वा बनी
नज़्म कहने को तो शायरी है मगर शायरी ही नहीं
शायरी तो ग़ज़ल के तमाशा गुरों का तमाशा हुई
नज़्म तो राज़ है
नज़्म फ़ितरत का संगीत और साज़ है
नज़्म बाहू का इरफ़ान, बुल्ले का विज़दान, ख़्वाजा की दस्तार है
नज़्म ख़ुसरो की मस्ती है, मंसूर का दार है
नज़्म रूमी, सादी, इक़बाल और अत्तार है
नज़्म हैरत के मारों का इनकार है
नज़्म ईसा के लब से अदा जब हुई तो मोहब्बत बनी
और मअबद के दस्तूर को रौंदती ज़ाबता बन गई
नज़्म रावण की लंका जलाती हुई
क़हर ढाती हुई
गुनगुनाती हुई, मुस्कुराती हुई
आग है, राग है, भाग है
नज़्म लिखते हुए सोचना चाहिए

