रोही पीर फरीदؒ की

हिज्र से छुपना चाहते थे हम इश्क की चादर डाल के
आंन ज़मीन पे जम बैठे हैं लोग थे हम पाताल के
शान में तेरी शेर लिखे हैं अत्तर में मिसरे ढाल के
अगर इजाज़त हो तो बोलें जोगी एक सवाल के
एक सवाल मोहब्बत का है, एक सवाल है यार का
एक उदासी का मौसम है, एक ग़िला दिलदार का
तनहाई में गुज़र गया है मौसम ऐन बहार का
पूछने वाला कोई नहीं है हाल तेरे बीमार का
एक ग़रीफ़त ज़माने की और एक शिकंजा मौत का
एक तारीकी नींद भरी और एक अंधेरा जागता
हिज्र में डूबा साज़ पड़ा है दर्द का राग अलापता
वही बचाए आकर हमको जो खुद उन से बच सका
पीर फरीदؒ अलावा तेरे कौन करे दिलदारियां
कौन उठाए नाज़ किसी के कौन निभाए यारियां
कौन सुने इस हिज्र के किस्से कौन करे ग़मख्वारियां
रो रो यार के हिज्र में हम ने अपनी आँखें हारियां
शेर, शऊर से जोड़ के नाता खुद को भोग लगा लिया
इश्क में ग़फलत बरत के हम ने फ़न को रोग लगा लिया
जान के सरमा आँखों में जब चाहा शोक लगा लिया
रूह को यकसर भूल के हम ने तन से योग लगा लिया
नीच बहुत थे सैयाँ हम ने नीचापन दिखला दिया
बर्तन ज़ंग अलूढ़ था लेकिन रगड़ रगड़ चमका दिया
अत्तर फ़रोशी करते करते नकली अत्तर बना दिया
यानि भेस बदल कर हम ने खुद को कहीं दफना दिया
भूल ख़ुदा को हम ने ढूंढा अदल किसी ज़ंजीर में
मज़हब, दीन, ईमान को हम ने सिर्फ रखा तहरीर में
असल को भूल के यार को ढूंढा हम ने सदा तस्वीर में
यार न पाया तो फिर गिन गिन ऐब गिने तक़दीर में
जिस्म कहीं पे ढेर किया और ध्यान कहीं पे लगा लिया
चोला हरी पहन कर हम ने खुद को पीर बना लिया
आग पकड़ने की कोशिश में हाथ भी अपना जला लिया
क़िस्मत से नाराज़ हुए जब हम ने सब कुछ पा लिया
तूबे सब वीरान हुए हैं सूख गई हरियालियां
मन मन भारी लगने लगी हैं कानों की अब बालियां
डायन बन के खून को चूसें हिज्र की रातें कालियां
यार बना सब ज़र्द हुई हैं रुखसारों की लालियां
सब किरदार मेरे जाते हैं भूल रही हैं कहानियां
पीत प्रीत का नाम नहीं है ख़ाक हुई हैं निशानियां
अन देखे एक हिज्र में खोएं अलहड़ शोख जवानियां
ग़म की आज कनिज़ें हैं सब अपने वक्त की रानियां
भर भर पीलो चगने वाली ख़ाली हैं अब झोलियां
पेंगं पंगोड़ें टूट गए और रूठ गई हमजोलियां
गीत गोये मरने लगे और फ़ौत हुई हैं बोलियां
इश्क ने कितनी जटियां सैयाँ रोही में हैं रोलियां
इश्क के पालन हार फरीदاؒ! सांवल अपने घर गए
और धमालें डालने वाले मस्त अलस्त बिखर गए
जो सुब्हान तेरी कुदरत कहते थे तीतर, मर गए
रोही के वीराने को बस नाम हमारे कर गए
रोही की सुनसान रातों में अपने आप को खो दिया
जिस्म खजूरों की शाखों पे डोका डोका प्रो दिया
देख के हाल हमारा रेत का ज़रा ज़रा रो दिया
गेंहूं के खेतों में मौला जंगली जैको बो दिया
फूलों की ख्वाहिश में हम ने कितने कांटे पा लिए
कांटे जो पैरों में चुभे थे आज सिरों तक आ लिए
ज़हर रगों में फैल रहा है आप ही आ के निकालिए
मीठे बेर समझ कर हम ने कड़वे तमें खा लिए
यार अजब हैं खुश बैठे हैं दिल की बाज़ी हार के
क़िस्मत आगे बंद हुए दरवाजे सोच विचार के
सारे लोहें ढल जाते हैं आगे एक लोहार के
जंग शदीद थी चाहत वाली, वार थे अपने सनार के
आश्क हमारे पास थे जो पल भर में वो सब बह गए
हिजरे जो तामीर किए थे आन की आन में ढह गए
एक ही इश्क किया था हम ने और उसमें भी रह गए
हम अपनी औकात से भी बढ़ कर मौला दुख सह गए
सोना पीतल लगने लगा है होश हमारे अजब गए
रेत से जी को ऐसे लगाया छूट खिलौने सब गए
पीर फरीदؒ भी रूठ के शायद हम से देस अरब गए
हिचकी हिचकी सांस रुक और आखिर जान बह लब गए
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