तो तुम नाराज़ हो मुझ से
ख़ता तो एक थी लेकिन सज़ा इतनी कि पूरा साल
यानी तीन सौ पैंसठ दिनों से तुम ने कोई ख़त नहीं लिखा
तुम्हें मालूम है मैं तीन सौ पैंसठ दिनों में
किन अज़ाबों में रहा हूं
तुम्हें मालूम ही क्या ज़अम जब भी टूटता है तो
मोहब्बत बे-यक़ीनी की सड़क पर चलने लगती है
बहुत से वाहमे दीमक की सूरत आदमी को चाट लेते हैं
तो दिल भी टूट जाता है
तुम्हें मालूम हो शायद
दरून-ए-जिस्म जब कुछ टूटता है तो
कोई आवाज़ भी पैदा नहीं होती
ज़रा सी देर को बस नब्ज़ रुकती है अंधेरा फैल जाता है
तशद्दुद से भरे तन्हाई के लम्हे
क़ियामत बन के ऐसे टूटते हैं
जिस तरह पत्थर बरसते हैं
तुम्हें मालूम ही क्या इंतज़ार-ए-ख़त में
आंखें सर्द गलियों में ठिठुर कर मरने लगती हैं
मेरी पेशानी पर रेखाओं की सूरत सदाएं रक़्स करती हैं
दिशाएं तंज़ करती हैं
अगर तुम ख़त नहीं लिख सकते तो फिर खुद पलट आओ
तुम्हें मैं और मेरे गांव की
ज़ईफ़-उल-उम्र गलियां याद करती हैं
ख़ता तो एक थी लेकिन सज़ा इतनी कि पूरा साल
यानी तीन सौ पैंसठ दिनों से तुम ने कोई ख़त नहीं लिखा
तुम्हें मालूम है मैं तीन सौ पैंसठ दिनों में
किन अज़ाबों में रहा हूं
तुम्हें मालूम ही क्या ज़अम जब भी टूटता है तो
मोहब्बत बे-यक़ीनी की सड़क पर चलने लगती है
बहुत से वाहमे दीमक की सूरत आदमी को चाट लेते हैं
तो दिल भी टूट जाता है
तुम्हें मालूम हो शायद
दरून-ए-जिस्म जब कुछ टूटता है तो
कोई आवाज़ भी पैदा नहीं होती
ज़रा सी देर को बस नब्ज़ रुकती है अंधेरा फैल जाता है
तशद्दुद से भरे तन्हाई के लम्हे
क़ियामत बन के ऐसे टूटते हैं
जिस तरह पत्थर बरसते हैं
तुम्हें मालूम ही क्या इंतज़ार-ए-ख़त में
आंखें सर्द गलियों में ठिठुर कर मरने लगती हैं
मेरी पेशानी पर रेखाओं की सूरत सदाएं रक़्स करती हैं
दिशाएं तंज़ करती हैं
अगर तुम ख़त नहीं लिख सकते तो फिर खुद पलट आओ
तुम्हें मैं और मेरे गांव की
ज़ईफ़-उल-उम्र गलियां याद करती हैं

