उदासी बढ़ने लगती है

किसी की याद में गुमसुम थकी हारी
सितारों के नगर से शाम जब भी लौट आती है
मेरी आंखों के वीरान सहन में सर को झुकाए चलने लगती है
उदासी बढ़ने लगती है
मेरे कानों में जब भी वस्ल के लम्हों की
क आहट सी आती है
तो मेरी हिज्र-आलूदा सी पलकों पर सितारे जाग उठते हैं
किसी की शक्ल बनती और बिखरती है
उदासी बढ़ने लगती है
कभी जब अनगिनत सदियों से चलते क़ाफ़िलों का सिलसिला
मुझ तक पहुंचता है
तो हिजरत पांव से सरगोशियां सी करने लगती है
उदासी बढ़ने लगती है
उदासी जब भी बढ़ती है
तो मुझ को दिल के बे-मकसद दरीचों, ताक़चों से झांकती है
और मेरे होंठों की खामोशी से मुझ को मांगती है
मेरे सीने पे फिर ये वहशियाना रक्स करती है
ये मेरे जिस्म के क़तबे पे कोई लफ़्ज़ लिखती है
उदासी रोज़ बढ़ती है
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