हुज़ूर नात का मतला सजा दिया जाए

हुज़ूर आप के क़दमों में सर रखा मैं ने
हुज़ूर अर्ज़ है सजदा सिखा दिया जाए

हमें चराग़ बनाता है या अली कहना

वह इस लिए कि तेरे इल्म में इज़ाफा हो
कई सवाल उठाता है या अली कहना

है जो ग़ुलाम-ए-मोहम्मद वो है ग़ुलाम-ए-अली

हम अहल-ए-हिंद गज़ब के हैं रिंद और हमें
हसन हुसैन पिलाते हैं भर के जाम-ए-अली

हुज़ूर-ए-इश्क़ हर इक मर्तबा हुसैन का है

हुसैन-ओ-मिन्नी से पढ़ या मिनल-हुसैन से पढ़
कि अब ज़मीन का हर क़ायदा हुसैन का है

सहरा में इक फूल है जिस में हर-हर रंग

चांद का इक दरबार है तारे दरबारी
तीन सौ तेरह मस्त हैं यानी सात मलंग

रूह हाज़िर है मेरे यार कोई मस्ती हो

मुझ को मिट्टी के प्याले में पिला ताज़ा शराब
जिस्म होने लगा बे-कार कोई मस्ती हो

धर्ती के बादशाह को सिर्फ नगर दिखाई दे

सोच हमारे ज़हन से इस बे मिसाल का जमाल
देख हमारी आँख से तुझ को अगर दिखाई दे

हुस्न हमतन गोश है इश्क सलाम करे

इश्क शरीअत साज़ है इश्क तरीक़त सोज़
हुक्म चलाए आप पर आप ग़ुलाम करे

सुख़न गोयम ब-तर्ज़-ए ऊ हो अल-हक़ हो, हो अल-हक़ हो

मैं उसके इश्क़ की मस्ती, मैं उसके हुस्न की शोखी
मैं उसके रू-ब-रू हो हो, हो अल-हक़ हो, हो अल-हक़ हो

हम पापी सरकार के, तुम ताज़ीम करो

आंखों भूके लोग हैं, चौखट पर आए
लंगर अपने हुस्न का अब तक़सीम करो

वो बड़ी बन के ज़माने से लड़ी जाती है

अब ये बंधन मेरी सांसों के लिए बंदिश है
अब अंगूठी मेरी उंगली में गड़ी जाती है

जलाल में भी कोई ढूंढ ले जामाल तो फिर

समझ में आएंगे तुझ को भी ढलती उम्र के दुख
बदल गए कभी तेरे भी ख़ुद-ओ-ख़ाल तो फिर

नींद की चाँदनी, ख़्वाब का रतजगा एक ख़ेमे में महफ़िल सजाई गई

बाँस और धात से एक आवाज़ निकली तो ख़ुसरो के सीने में सुर भर गए
हिंद के साज़ पर तुर्क तारें जुड़ीं, ख़्वाजगाँ के लिए धुन बनाई गई

आग बुझा रहा हूँ मैं

आँखें बना रहा है तू
आंसू बहा रहा हूँ मैं

रूह को वज़्द में ला रक़्स दिखा

आसमान रोंद कभी पैरों में
और ज़मीन सर पे उठा रक़्स दिखा

एक कारवां बना तो बने कारवां के लोग

हम जैसे हैं मगर वो हमारी तरह नहीं
आए हैं कायनात में क़ब्ल-ए-जहां के लोग

बुझ चुकी आग दिल जला ही नहीं

अपने महबूब के तसव्वुर में
मैं भी तनहा हूँ बस खुदा ही नहीं

वो अंधेरा था, अंधेरे में, दिया मैं भी था

उम्र भर कोई नहीं रहता किसी के दिल में
आज कल तो है कभी तेरी जगह मैं भी था

बना के राख हवा में उड़ा दिया पत्थर

किसी के हिज्र ने आवाज़ छीन ली मेरी
फिर इंतजार ने मुझ को बना दिया पत्थर

ज़मीन की खुद नुमाइयों में उलझ चुका हूँ

मुझे ज़्यादा डरा दिया है मुआशरे ने
कुछ इस लिए भी कमाइयों में उलझ चुका हूँ

हुज्जत-ए-क़ाल और है अज़मत-ए-हाल और है

सुर्ख़ी-ए-इश्क़ पर न भूल, तर्ज़-ए-जमाल को समझ
शाम का रंग और है, रुख़ पे गुलाल और है

बढ़ कर न लड़ा कोई बताई हुई हद से

मैं सिफ़र कि जिसकी कोई क़ीमत है न क़ामत
अदाद निकाले गए मुझ ग़ैर-अदद से

मैं खजूरों भरे सहराों में देखा गया हूँ

बख़्त हूँ और मुझे ढूंढने वाले हैं बहुत
हुस्न हूँ और हसीनाओं में देखा गया हूँ

राह में छोड़ कर नहीं जाता

सब तेरी अंजुमन में बैठे हैं
कोई भी शख्स घर नहीं जाता

उस की आँखों के दरीचों में रहा करते थे

ऐ मोहब्बत को बड़ा काम समझने वालों
ये बड़ा काम कभी हम भी किया करते थे

दिल से इक याद भुला दी गई है

मैं ने मंज़िल की दुआ माँगी थी
मेरी रफ़्तार बढ़ा दी गई है

हमारे हाफ़िज़े बेकार हो गए साहिब

उसे भी शौक़ था तस्वीर में उतरने का
तो हम भी शौक़ से दीवार हो गए साहिब

मिल रहे हो बड़ी अकीदत से

उसने हैरान होना सीख लिया
मैंने देखा ही इतनी हैरत से

देखो उसका हिज्र निभाना पड़ता है

सुनते कब हैं लोग हमें, बस देखते हैं
चेहरे को आवाज़ बनाना पड़ता है

तामाम उमर जले और रोशनी नहीं की

सितम तो ये है कि मेरे खिलाफ बोलते हैं
वो लोग जिनसे कभी मैंने बात भी नहीं

देख चुके जब दुनिया सारी मस्त हुए

आदम से लेकर मुझ तक आँखों वाले
देख के उस को बारी बारी मस्त हुए

हम ने पूरा जोर लगा कर रक्स किया

दुनिया मस्तों को बे इल्म समझती थी
हम ने फिर क़ुरआन सुना कर रक्स किया

शोर अगर होता तो कहता शीशा टूटने वाला है

मैं वह शख्स हूँ जिस ने किसी के बहते आँसू रोके हैं
मुझे बताओ कहां कहां से दरिया टूटने वाला है

दिखा रहा हूँ तमाशा समझ में आजाए

ये लोग जा तो रहे हैं नए ज़माने में
दुआ करो उन्हें रस्ता समझ में आ जाए

सदा लपेट के दिल जाएँगे वगर्ना नहीं

वो आज दरिया से लड़ने की ठान कर गए हैं
कहीं किनारे पे मिल जाएँगे वगर्ना नहीं

अब्द होने का तजुर्बा क्या है

तुम उन्हें बारिशें समझते हो
हमने रोने का तजुर्बा किया है

बस यही कुछ है मर्तबा मेरे पास

तुझे कुछ वक्त चाहिए मेरी जान
वक्त ही तो नहीं बचा मेरे पास

शदीद गिरिया का मतलब बता रहा था हमें

हम उसके उठे हुए हाथ की तरफ भागे
पता चला कि वो रास्ता दिखा रहा था हमें

चश्म-ए-नमनाक ने समझना है

कितना पानी है तेरी आँखों में
एक तैराक ने समझना है

नज़र उठा के मेरे सामने खड़े हो तुम

ये टहनियाँ नहीं देखो तो मेरी बाँहें हैं
और इनसे फूल नहीं दोस्तों झड़े हो तुम

कहने लगे दरख़्त सहारा कोई तो हो

कुछ इस लिए भी तुमसे मोहब्बत है मुझको दोस्त
मेरा कोई नहीं तुम्हारा कोई तो हो

रात खामोश हुई और पुकारी गई सुबह

ऐ सुख़न साज़ बदन तेरे लिए शाम बनी
ऐ रज़ा मंद हंसी तुझ पे उतारी गई सुबह

अजीब मन्तिक़ से दिल हमारे भरे हुए हैं

विसाल को हिज्र कहते कहते गुज़र रही है
किसी की क़ुर्बत से इस क़दर हम डरे हुए हैं

मुझ पे राज़ खुल चुका मेरे दोस्त

मैं अकेला लडूँगा दुनिया से
तेरे जिम्मे सिर्फ दुआ मेरे दोस्त

गुलाब थे बिखर गए

मज़ार तो न बन सके
कबूतरों से भर गए

मशवरा मान दोस्ता खामोश

मैं बहुत बोलता था सो मुझ को
नमत्तों से किया गया खामोश

बिछड़ रहे थे कोई हौसला ज़रूरी था

इन्हीं दिनों मुझे जब मिल रहे थे दूसरे लोग
इन्हीं दिनों तेरा मिलना बड़ा ज़रूरी था

किसी निगाह की तअसीर हो के खुलते हैं

मिले बग़ैर कभी रद्द हमें नहीं करना
कई हिजाब बग़लगीर हो के खुलते हैं

क़ैस का शजरह न कोई हम को शोहरत चाहिए

हम जहां पर हैं वहां ख़्वाहिश का होना है हराम
और होंगे इश्क़ में जिन को सहूलत चाहिए

गुज़र चुके हैं जो उनके निशान ही देख आएं

गुज़श्तगान की महरूमियां ही देख आएं
खंडर में बिखरी हुई रसियां ही देख आएं

क़ैस और लैला का तरफ़दार अगर मर जाए

फिर ख़ुदाया तुझे सूरज को बुझाना होगा
आख़री शख़्स है बेदार अगर मर जाए

वह हाथ हाथों में थाम कर मुस्करा रहा हूँ

अभी उसे ख्वाब जैसी नेमत नहीं दिखाई
अभी तो मैं उसको सिर्फ दुनिया दिखा रहा हूँ

मावज़ना अगर अपना किताब से करेगी

हमें कहेगी कि ख्वाबों में छोड़ दो रहना
फिर अपनी बात का आग़ाज़ ख्वाब से करेगी

यह नहर और किनारे तुम्हें समझते हैं

हमें तो छोड़ो कि हम इस जहां के हैं ही नहीं
सवाल यह है तुम्हारे तुम्हें समझते हैं

हर दुआ मेरी बे असर तो नहीं

तू कोई और कूज़ा गर तो नहीं
मैं किसी और चाक पर तो नहीं

मशविरा जो भी मिला हमने वही मान लिया

हाथ उठाया था सितारों को पकड़ने के लिए
चर्ख़ ने चांद को ख़ंजर की तरह तान लिया

है मेरे वास्ते दुआ मेरा इश्क

बस तुझे मांगना नहीं आया
मेरी झोली तो भर चुका मेरा इश्क

मैं ऐसे मोड़ पर अपनी कहानी छोड़ आया हूँ

अभी तो उससे मिलने का बहाना और करना है
अभी तो उसके कमरे में निशानी छोड़ आया हूँ

सहूलत हो अज़ीहत हो तुम्हारे साथ रहना है

हमारे राबते ही इस क़दर हैं तुम हो और बस तुम
तुम्हें सबसे मोहब्बत हो तुम्हारे साथ रहना है

फलक के चाँद को घरकाब देखने के लिए

बवक्त-ए-फजर बलाए गए हैं मस्जिद में
तमाम रात के बे-ताब देखने के लिए

सहरा में जा रहे हो तुम, मजनूं अगर दिखाई दे

मेरे सिवा कोई नहीं, मैं भी अगर यहां नहीं
फिर ये हिजाब किस लिए, नीचे उतर दिखाई दे

अब हैं वो नामुरादियां, इश्क़ की ताब भी नहीं

ऐसा हुआ हूँ राइगां, उम्र गुज़र गई मगर
कोई गुनाह भी नहीं, कोई सवाब भी नहीं।

चला गया है वो लेकिन निशान अब भी हैं

ये और बात कि रहना मेरा गवारा नहीं
तुम्हारे शहर में खाली मकान अब भी हैं।

इक गली इक गली के साथ बनी

एक आवाज़ मुझ तक आई थी
जिस पे लब रख दिए तो बात बनी

बहुत शिद्दत से जो क़ायम हुआ था

पाँच तनौं का भेद है, सात फ़क़ीर एक हैं
तख़्त-ए-जमाल-ए-इश्क़ पर हुस्न बिठा दिया गया

जल्वा-ए-नूर के लिए जिस्म नक़ाब हो गया

मोहब्बत ने अकेला कर दिया है
मैं अपनी ज़ात में इक क़ाफ़िला था।

एक सुख़न को भूल कर एक कलाम था ज़रूर

कर्ब-ओ-बला के बाद अब कश्ती-ए-नूह चाहिए
प्यास की बारगाह में पानी अज़ाब हो गया।

सफ़्हे पलट रहा हूँ मैं, शेर सुना रहा हूँ मैं

काँप रहे थे मेरे हाथ, चीख़ रहे थे बाम-ओ-दर
ज़हर अगर नहीं था वो आख़िरी जाम था ज़रूर।

जैसा हूँ, जिस हाल में हूँ, अच्छा हूँ मैं

खोना था जिसको खो चुका, रोना था जितना रो चुका
ख़ुद से मज़ाक करके अब ख़ुद को हँसा रहा हूँ मैं।

ख़ुश्क पतों की सूरत बिखर जाऊँगा, मैं तो मर जाऊँगा

खुले हुए दरवाज़ों पर दस्तक मत दो
अंदर आ जाओ, पहचान चुका हूँ मैं।

ये लोग इस लिए मुझ को गले लगा रहे हैं

रास्ते में कोई जिन भी आ सकता है इस कहानी में भी
मेरी शहज़ादी, फिर मैं किधर जाऊँगा, मैं तो मर जाऊँगा।

छोटे होने लगे बड़े मेरे

बाप के दुश्मनों की फ़तह हुई
भाई आपस में लड़ पड़े मेरे

शाम-ए-ग़म-ए-हुसैन में नाम-ए-अली लिया गया

ख़ैमे जला दिए गए, फिर ये फ़ुज़ूल बहस है
ऐसे नहीं किया गया, वैसे नहीं किया गया

शाम-ए-ग़म के सब सहारे टूट कर

एक तुम्हारा इश्क़ ज़िंदा रह गया
मर गए हम लोग सारे टूट कर

ख़ुदा मिलाते हैं ज़ौक़-ए-ख़ुदाई देते हैं

हज़ार हाय! वो लश्कर न सुन सका लेकिन
हुसैन हिंद में अब तक सुनाई देते हैं

सख़्न तमाशा बना शायरी ख़राब हुई

शिकवा-ए-कार-ए-सुख़न ऐ बुलंद गोयाई
तुझे सँवार के दुनिया मेरी ख़राब हुई