इश्क़ में हारे हुए जिस्म
तुमने देखी है कभी
इश्क़ के मस्त क़लंदर की धमााल
दर्द की ले में पटखता हुआ सर और तड़पता हुआ तन मन
पीर पत्थर पे भी पड़ जाएं तो धूल उठने लगे।
और किसी ध्यान में लिपटा हुआ ये हिज्रज़दा जिस्म,
रक़्स करता हुआ गिर जाए कहीं,
तो ज़मीन दर्द की शिद्दत से तड़पने लग जाए
हिज्र की लंबी मुसाफ़त का रिधम,
घोड़ों की टापों में गूंथा हुआ है।
रक़्स दरअसल रियाज़त है किसी ऐसे सफ़र की,
जिसे वो कर नहीं पाया
तुमने देखे हैं कभी
शहर के वसत में घड़ियाल के रोंदे हुए पल,
जिनमें चाहत के हज़ारों क़िस्से,
इश्क़ के सब्ज़ उजाले में कई ज़र्द बदन,
अपने होने की सज़ा काट रहे हैं
तुमने देखे नहीं शायद
ये लोग इस लिए मुझ को गले लगा रहे हैं
रास्ते में कोई जिन भी आ सकता है इस कहानी में भी
मेरी शहज़ादी, फिर मैं किधर जाऊँगा, मैं तो मर जाऊँगा।
इमान
सहीलियों ने कहा
दौर फ़लसफ़े का नहीं
दिलों में बात नहीं सिर्फ़ खून होता है
हाल
ए ख़ुदा तुझ में खो गया था मैं
लोग करते रहे नमाज़ अदा
और मस्जिद में सो गया था मैं
राह में छोड़ कर नहीं जाता
सब तेरी अंजुमन में बैठे हैं
कोई भी शख्स घर नहीं जाता
शाम-ए-ग़म के सब सहारे टूट कर
एक तुम्हारा इश्क़ ज़िंदा रह गया
मर गए हम लोग सारे टूट कर
दिखा रहा हूँ तमाशा समझ में आजाए
ये लोग जा तो रहे हैं नए ज़माने में
दुआ करो उन्हें रस्ता समझ में आ जाए
धरती वालों (पंजाबी)
असां सिवियाँ लगे बांस हाँ ते अजनड़े हुए शहर
कदी आ असाड़े कोल वी ते वेख असाड़ी लहर
कदी शाह रग साड़ी छोड़ के साड़े दिल दे अंदर ठहर
मलंग
हाथों से कश्कोल ने पूछा
कितने दर बाकी हैं
इस बस्ती में कितने घर बाकी हैं
शदीद गिरिया का मतलब बता रहा था हमें
हम उसके उठे हुए हाथ की तरफ भागे
पता चला कि वो रास्ता दिखा रहा था हमें
ख़ुदा मिलाते हैं ज़ौक़-ए-ख़ुदाई देते हैं
हज़ार हाय! वो लश्कर न सुन सका लेकिन
हुसैन हिंद में अब तक सुनाई देते हैं
शायर
आख़िरी जुमला बोल दिया जाए तो बात मुकम्मल हो जाती है
आंखें अश्कों से भर जाती हैं
और सारे मंज़र धुंधले हो जाते हैं।
शाम-ए-ग़म-ए-हुसैन में नाम-ए-अली लिया गया
ख़ैमे जला दिए गए, फिर ये फ़ुज़ूल बहस है
ऐसे नहीं किया गया, वैसे नहीं किया गया
छोटे होने लगे बड़े मेरे
बाप के दुश्मनों की फ़तह हुई
भाई आपस में लड़ पड़े मेरे
नज़र उठा के मेरे सामने खड़े हो तुम
ये टहनियाँ नहीं देखो तो मेरी बाँहें हैं
और इनसे फूल नहीं दोस्तों झड़े हो तुम
देखो उसका हिज्र निभाना पड़ता है
सुनते कब हैं लोग हमें, बस देखते हैं
चेहरे को आवाज़ बनाना पड़ता है
मैं खजूरों भरे सहराों में देखा गया हूँ
बख़्त हूँ और मुझे ढूंढने वाले हैं बहुत
हुस्न हूँ और हसीनाओं में देखा गया हूँ
فردیات
وڈیو مشاعرے
कहे नदीम फकीर साईं दा
इक़बाल कह गए कि इल्म की इंतहा हैरत है, इश्क़ की इंतहा क्या है? इस बारे में सोचना ही ग़ालिबन सादगी के ज़ुमरे में आता है... मुझ ऐसे गुनहगार ज़र्रा कम तरीन के नज़दीक एक लامتनाही ख़ौफ़। लरज़ उठता हूँ ये सोच कर कि नदीम भाभा की मुसलसल फैलती अना उसे कहाँ ले जाएगी। ख़ाक क्या ख़ाक भर पाएगी इस बे-पायां शिगाफ़ को, जिस में जितनी मिट्टी डालें उस से कई गुना ज़्यादा बढ़ जाता है। एक तो मुँह में जाह ओ हशमत का पैदाइशी चम्मच... उस पर तबीयत माइल ब-तलाश-ए-हक़, मजीद बर-आँ अना का हज्म ऐसा कि अल्लाह के सिवा किस को ताक़त कि उसे भर पाए और फिर हाथ में शायरी का फ़न। मामला न किसी रफ़ीक़ के हाथ में, न किसी उस्ताद की क़ुदरत में और न ही नदीम के अपने बस में, रहम करे तो वो जो रहीम और करीम है
ज़ेर-ए-नज़र मजमूआ का एक बड़ा हिस्सा नदीम के शाए किया हुआ मजमूआ-ए-क़लाम पर मुश्तमिल है, सो नदीम की शायरी का हाल में यकजा होना क़ारईन और नक़ादों के लिए जो जो सहूलत रखता है वो अपनी जगह लेकिन अब तक के कुल क़लाम की गवाही इस की अपनी ज़ात और मआनी के लिए अज़-हद ज़रूरी है
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